पायलट से जंग में फंस गये सीएम गहलोत ? राजनीतिक जीवन की सबसे कठिन लडाई लड रह गहलोत !

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राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत विज्ञान में स्नातक, अर्थशास्त्र में परास्नातक और कानून के छात्र रहे हैं। 69 वर्षीय गहलोत कहीं जगन्नाथ पहाड़िया तो कहीं मोहन लाल सुखाड़िया जैसे दिग्गज कांग्रेस के नेताओं से सीख लेने के बाद भाजपा के संस्थापक नेताओं में रहे भैरोंसिंह शेखावत की तरह राजनीति के घाघ के माने जाते हैं।

लेकिन माना जा रहा है कि पार्टी के हर गुट पैठ और भाजपा नेता वसुंधरा राजे से संतुलित रिश्ता रखने वाले गहलोत की कूटनीति की अग्नि परीक्षा शुरू हो गई है। गहलोत अब विधानसभा में विश्वासमत पाकर भाजपा और विरोधियों का मुंह बंद कर देने वाली 14 अगस्त वाली पारी खेल रहे हैं।

सचिन पायलट की खामोशी बढ़ा रही है क्लाइमैक्स
कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की टीम में शुमार रहने वाले बागी नेता सचिन पायलट ने गहलोत की मुश्किल बढ़ा दी है। सचिन पायलट कांग्रेस में ही हैं। उनके साथ कांग्रेस पार्टी के 18 विधायक स्पष्ट तौर पर हैं। खामोश रहकर, खुद को कांग्रेसी बताकर सचिन पायलट कम से कम 30 विधायकों के समर्थन का दावा कर रहे हैं।

पायलट ने खम ठोककर अशोक गहलोत की सरकार को अल्पमत में बताया है। विधायकों की सदस्यता बचाने के लिए कानूनी से लेकर राजनीतिक दांव चल रहे हैं, लेकिन पार्टी के व्हिप का उल्लंघन भी कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता सचिन पायलट की गतिविधियों को पार्टी विरोधी मानते हुए बागी करार देते हैं, लेकिन पार्टी में लौट आने, भाजपा के खिलाफ विचारधारा की लड़ाई लड़ने का अभी भी आमंत्रण दे रहे हैं।

कांग्रेस पार्टी के अशोक गहलोत के अलावा दूसरे धड़े के भी तमाम नेताओं का मानना है कि सचिन पायलट अपने मित्र ज्योतिरादित्य सिंधिया के इशारे पर भाजपा की गोद में खेल रहे हैं। अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव कहती हैं कि उनमें पोटेंशियल है, लेकिन यदि भाजपा के षड्यंत्र में राजस्थान की सरकार गिर गई तो लोकतंत्र के लिए बहुत खराब दिन होगा। कुल मिलाकर सचिन पायलट की चुप्पी क्लाइमैक्स बढ़ा रही है।

हर रोज गहलोत को देना पड़ रहा है बयान

आम तौर पर नाप-तौलकर बोलने वाले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को इन दिनों लगभग हर दिन न केवल राजनीतिक अभियान चलाना पड़ रहा है, बल्कि बोलना पड़ रहा है। दिलचस्प है कि पार्टी गहलोत के साथ खड़ी है, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी समेत तमाम वरिष्ठ नेता अभी इस मसले पर खुलकर कुछ भी नहीं बोल रहे हैं।

पार्टी के संगठन महासचिव वेणुगोपाल से लेकर राहुल गांधी के टीम की निगाह जयपुर में हर रोज बदलने वाले घटनाक्रम पर लगी है। हालांकि पार्टी के एक वरिष्ठ महासचिव मान चुके हैं कि कांग्रेस के पास समझौते के केवल दो रास्ते हैं। पहला अशोक गहलोत को राजस्थान के मुख्यमंत्री पद से हटाकर इसका पटाक्षेप करे।

सूत्र का कहना है कि यह जटिल और नामुमकिन सा निर्णय होगा। दूसरा रास्ता बिना सचिन पायलट और उनके सहयोगियों के 103 विधायकों की संख्या बनाए रखने का है। यह भी किसी चुनौती से कम नहीं है

एक नजर में अशोक गहलोत

बिना धार के हथियार से दुश्मन को राजनीतिक कौशल के सहारे पटखनी देने में मुख्यमंत्री गहलोत का कोई जवाब नहीं है। पार्टी के भीतर कुछ लोग उन्हें मीठी छुरी कहते हैं। एक वर्ग ऐसा भी है जो मिट्ठू तोता की संज्ञा देता है। एक समय था जब गहलोत एआईसीसी में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ कार्यालय का कमरा शेयर करते थे। पिछले दिनों पर जाएं तो गहलोत 1971 से ही राजनीति, समाजसेवा के क्षेत्र में सक्रिय हैं।

70 का दशक
अशोक गहलोत ने 1971 में भारत-पाकिस्तान के युद्ध के बाद पश्चिम बंगाल में 24 परगना समेत अन्य जिलों में शरणार्थी शिविरों में जाकर काम किया। तब वह कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई से जुड़े थे। 1973-79 में वह एनएसयूआई राजस्थान के अध्यक्ष रहे। 1979 में गहलोत जोधपुर जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बन गए थे। इस पद पर वह 1982 तक रहे।
संसदीय राजनीति और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा

इंदिरा, राजीव से लेकर नरसिंह राव मंत्रिमंडल तक : अशोक गहलोत के संसदीय राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1980 में हुई। वह जोधपुर की लोकसभा सीट से चुनाव जीत गए। 2 सितंबर 1982 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें अपने मंत्रिमंडल में पर्यटन और नागरिक उड्डयन मंत्रालय में उपमंत्री बनाया। 184 में खेल उपमंत्री बनाए गए।

31 दिसंबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री ने उन्हें नागरिक उड्डयन मंत्रालय का प्रभार सौंपते हुए केंद्रीय मंत्री बनाया। बाद में कपड़ा मंत्री बनाया गया। जून 1989 में अशोक गहलोत राजस्थान सरकार में गृह तथा जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग के मंत्री बनाए गए।

1991 में अशोक गहलोत फिर केंद्रीय मंत्री बने। 1993 तक उनके पास कपड़ा मंत्रालय का प्रभार रहा। इस तरह से गहलोत ने जोधपुर लोकसभा का 1980-84, 1984-89, 1991-96, 1996-98, 1998-1999 में प्रतिनिधित्व किया।

राजस्थान में मंत्री और मुख्यमंत्री की पारी

अशोक गहलोत राजस्थान सरकार में 1989 में कुछ महीने के लिए मंत्री बन गए थे। फिर केंद्रीय राजनीति में लौट आए। लेकिन इसके बाद 1999 में गहलोत का फिर से राजस्थान की राजनीति में लौटना हुआ। 1999 के विधानसभा चुनाव में जोधपुर की सरदारपुरा विधानसभा से चुने गए। यहां से वह लगातार हर विधानसभा चुनाव में जीतते रहे।

पहली दिसंबर 1998 को उन्होंने राजस्थान के मुख्यमंत्री का कार्यभार संभाला और पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। 2008 में फिर राजस्थान के मुख्यमंत्री बने। पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। 2018 में फिर वह तीसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। परंतु इस बार ताजा सियासी संकट ने उनकी राह में कांटा बो दिया है।

34 साल में गहलोत भी बने थे राजस्थान प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष
सचिन पायलट को अशोक गहलोत कम उम्र में बड़ी जिम्मेदारी का चाहे जितना बड़ा ताना मारें, लेकिन वह भी 34 साल की उम्र में ही राजस्थान के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बन गए थे। 3 मई 1951 को पैदा हुए गहलोत 29 साल में सांसद, 31 साल में केंद्र सरकार में मंत्री बन गए थे। 34 साल की उम्र (1985) में ही उन्हें केंद्र सरकार में पूर्ण कालिक केंद्रीय मंत्री बनाया गया था।

47 साल की उम्र में तीन बार केंद्रीय मंत्री, पांच बार सांसद बनने के बाद मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिल गया था। साल 1998 से आज तक जब भी कांग्रेस राजस्थान में सरकार बनाने की स्थिति में आई, मुख्यमंत्री का ताज अशोक गहलोत के सिर रहा। केंद्रीय और राज्य पार्टी संगठन में लगातार महत्वपूर्ण पद पर रहे, जिम्मेदारी निभाई।
राजनीतिक जीवन का सबसे जटिल कांटा

अशोक गहलोत के 69 साल के राजनीतिक जीवन का यह सबसे कठिन दौर है। उनसे जूनियर राजेश पायलट के पुत्र, पूर्व केंद्रीय मंत्री सचिन पायलट उनके गले में मछली के कांटे की तरह अटक गए हैं। सचिन पायलट 2018 में भी खुद को मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार मान रहे थे।

राहुल गांधी और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने सचिन को उपमुख्यमंत्री पद के लिए मनाकर गहलोत को यह दायित्व सौंपा था, लेकिन दोनों नेताओं में नहीं बनी। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अंतत: सचिन पायलट को कटी पतंग बनाने की ठान ली और इसके सामानांतर सचिन पायलट ने भी अपना राजनीतिक किला बनाते हुए चुनौती दे दी है।

सचिन पायलट कहते हैं कि मैं कांग्रेसी हूं। भाजपा में नहीं जाऊंगा। अशोक गहलोत की सरकार के पास बहुमत नहीं है। हमें 30 विधायकों का समर्थन है। पायलट इतना कहकर चुप हैं। अशोक गहलोत लगातार हमलावर हैं। साख दांव पर है। अब दोनों ही विश्वास और संशय में हर दिन व्यतीत करते हुए 14 अगस्त के आने की पारी खेल रहे हैं।

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