पायलट के सामने बडी चुनौती, क्या पायलट होगें सफल ?

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राजस्थान के रेतीले बवंडर के थमने के आसार नहीं हैं. अहम के टकरावों की लड़ाई में सियासी ऊंट किस करवट बैठेगा, ये भी अनिश्चित है. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उनके पूर्व डिप्टी सचिन पायलट अब भी आमने सामने डटे हैं.
राजस्थान कांग्रेस संकट के कुछ तत्वों में से एक ये भी है कि पार्टी अब उस स्थिति में नहीं लौटेगी जब पायलट ने अपने 18 वफादार विधायकों के साथ वॉकआउट किया. और 200 सदस्यीय सदन ग्रैंड ओल्ड पार्टी के पास तलवार की धार पर चलने जैसा कम बहुमत रह गया.
कभी कांग्रेस के भविष्य के रूप में जिन पायलट का नाम लिया जाता था उनके पास सिर्फ चुनौतीपूर्ण विकल्प बचने हैं. कांग्रेस के पाले से बाहर रहने की स्थिति में क्या वह राजस्थान के मुख्यमंत्री बनेंगे? क्या पायलट ऐसा कर सकते हैं?

अगर पायलट अब एक ऐसे संगठन का निर्माण करने की योजना बना रहे हैं जिसकी धुरी मुख्यमंत्री के रूप में उनके इर्दगिर्द रहे, तो पिछले रुझानों से लगता है कि उनकी किस्मत चूक सकती है. सीधे शब्दों में कहें, किसी भी क्षेत्रीय दल ने कभी भी इस रेगिस्तानी राज्य में किंगमेकिंग जैसी हैसियत हासिल नहीं की है. अगर पायलट बीजेपी के साथ जाना पसंद करते हैं, तो वह फिर राज्य में सबसे ऊंचा पद अपने हाथों से बीजेपी के कई कद्दावर नेताओं में से किसी के हाथ में फिसलता देख सकते हैं.

राजस्थान की क्षेत्रीय समस्या
70 साल की राज्य की राजनीति में, सभी दलों में गंभीर गुटबाजी के बावजूद क्षेत्रीय पार्टी का प्रभाव बहुत कम रहा है. बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे कई हिंदू हार्टलैंड राज्यों के विपरीत, राजस्थान की राजनीति ने राज्य में कभी मजबूत क्षेत्रीय शक्ति के पनपने को इजाजत नहीं दी.
क्षेत्रीय दल राजस्थान में रहे हैं. पहले दो राज्य विधानसभा चुनावों के बीच के शुरुआती दौर में, अखिल भारतीय राम राज्य परिषद (आरआरपी) कांग्रेस के लिए एक चुनौती के रूप में उभरी, लेकिन इसके विकल्प के तौर पर पेश आने के लिए पर्याप्त आधार नहीं था. पहले दो चुनावों के बाद, आरआरपी ने प्रासंगिकता खो दी. उसका वोट शेयर 10 फीसदी वोट से घटकर 2 फीसदी पर आ गया.

बाद के वर्षों में, आरआरपी का जनसंघ में विलय हो गया. 1962 से 1972 तक तीन विधानसभा चुनावों के बीच, स्वतंत्र पार्टी ने एक मजबूत दस्तक दी और राज्य में सत्तारूढ़ कांग्रेस की विरोधी बन गई. लेकिन अपने शीर्ष प्रदर्शन के दौरान भी इस पार्टी को केवल 22 फीसदी वोट मिले. 1967 में यह कांग्रेस के वोट शेयर की तुलना में 20 फीसदी कम थे. 1993 के बाद से, जब राज्य बीजेपी और कांग्रेस के बीच पूरी तरह से बाइपोलर हो गया, तो भी कोई क्षेत्रीय दल राज्य में दमदार उपस्थिति दर्ज कराने में सक्षम नहीं हुआ

बीएसपी फैक्टर
बीएसपी ने राजस्थान में कांग्रेस-बीजेपी की बाइपोलर राजनीति को चुनौती देने की कोशिश की. इसने अनुसूचित जाति का एकमात्र दावेदार बनने पर दांव खेला, जिसकी आबादी 2011 की जनगणना के अनुसार 18 प्रतिशत है, और जो राज्य का सबसे बड़ा मतदाता इकलौता समूह था. लेकिन पार्टी का सबसे अच्छा प्रदर्शन 2008 के विधानसभा चुनावों में था जब बीएसपी को 8 प्रतिशत वोट मिले और उसने छह सीटें जीतीं.

2018 के आखिरी विधानसभा चुनाव में, बीजेपी के दो पूर्व नेताओं ने अपनी पार्टियां बनाईं. हनुमान बेनीवाल के नेतृत्व में आरएलपी और घनश्याम तिवारी की अगुआई में भारत वाहिनी पार्टी सामने आईं. फिर भी, ये दोनों नए दल मिलाकर भी तीन प्रतिशत से भी कम वोट पा सके और सिर्फ तीन विधानसभा सीटें इनके खाते में आईं.

क्यों क्षेत्रीय दल रहे नाकाम?
पिछले सात दशकों में राजस्थान के किसी भी क्षेत्रीय प्लेयर या पार्टी को पेश करने में नाकाम रहने का एक कारण ये भी है कि कोई नेता (बीजेपी और कांग्रेस के बाहर) ऐसा नहीं रहा जो अपने निजी करिश्मे के साथ राज्य में मजबूत निर्वाचन क्षेत्र का निर्माण कर सकता हो. इसके अलावा, राज्य की जटिल जाति डायनामिक्स और नेताओं के बीच मजबूत वैचारिक, दूरदर्शी एजेंडे की कमी ने राजस्थान में क्षेत्रीय पार्टी की संभावना को परवान नहीं चढ़ने दिया.

दमदार मौजूदगी के नुस्खे के लिए क्षेत्रीय पार्टी या नेता के पास मजबूत उपस्थिति, जातिगत आधार और एक वैचारिक स्पष्टता होना जरूरी है. बिहार और उत्तर प्रदेश में यादवों और महाराष्ट्र में मराठाओं के विपरीत, राजस्थान में कोई भी जाति (एससी जैसे समुदाय नहीं) ऐसी नहीं जो पूरे राज्य में फैली हुई हो.
जाट राज्य में सबसे बड़े इकलौते जाति समूह हैं, लेकिन उत्तर की तुलना में दक्षिण राजस्थान में उनकी उपस्थिति कम है. इसी तरह भरतपुर और जयपुर संभाग में गुर्जरों की मजबूत उपस्थिति है. जोधपुर संभाग में जाटों की तरह फिर से गुर्जर मतदाता की उपस्थिति नगण्य है. साथ ही, बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने, राज्य में विभिन्न प्रमुख जाति और समुदायों से अपने नेता तैयार किए.

दूसरा, राज्य के अधिकांश नेता जिन्होंने किसी बड़ी पार्टी से अलग होकर गुट बना लिया, उन्होंने ऐसा किसी मजबूत वैचारिक कारण या भावनात्मक जुड़ाव की वजह से नहीं किया बल्कि खुद की महत्वाकांक्षा के पीछे दौड़ने के लिए किया. हालिया समय में ऐसा कोई भी नेता बीजेपी और कांग्रेस के खिलाफ स्पष्ट वैचारिक स्थिति का प्रस्ताव रख पाने में कामयाब नहीं हुआ.
उन्होंने हमेशा ऐसी बयानबाजी बहुत की कि वे लोगों के विकास के लिए काम करेंगे. लेकिन कोई भी कभी भी मतदाताओं को यह नहीं समझा सका कि जो वादा वो कर रहे हैं, उसे कैसे पूरा करेंगे.

रेगिस्तान राज्य में गुटबाजी
राजस्थान में गुटबाजी का लंबा इतिहास रहा है. 1951 के पहले राज्य विधानसभा चुनाव में, सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी केवल 160 में से 81 सीटें जीतने में सक्षम हुई जो बस बहुमत लायक ही आंकड़ा था. हालांकि, दूसरे दल के नौ दलबदलुओं ने कांग्रेस को 90 सीटों तक अपनी संख्या बढ़ाने में मदद की.

1962 में फिर ऐसे ही नतीजे सामने आए जब कांग्रेस 176 विधानसभा सीटों में से 88 पर जीती. यह सिर्फ 50 फीसदी सीटें थीं – बहुमत नहीं. हालांकि, कांग्रेस फिर दलबदल के दम पर सरकार बनाने में कामयाब रही.
1977 के विधानसभा चुनाव से पहले तक कांग्रेस राज्य में सबसे प्रमुख राजनीतिक ताकत बनी रही. इस दौरान कांग्रेस का दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति से वोट शेयर का अंतर हमेशा 20% से अधिक बना रहा.
ऐसा नहीं कि उस अवधि में कांग्रेस में गुटबाजी नहीं रही. 1949 में राज्य के गठन से लेकर 1954 तक राजस्थान ने पांच साल में चार मुख्यमंत्री देखे- हीरालाल शास्त्री, सीएस वेंकटाचारी, जय नारायण व्यास और टीका राम पालीवाल. राज्य के केवल पांचवें मुख्यमंत्री, मोहन लाल सुखाड़िया को पहली बार मुख्यमंत्री के तौर पर राज्य में पांच साल का कार्यकाल पूरा करने में कामयाबी मिली.

राजस्थान में कांग्रेस के लिए गहलोत बनाम पायलट की लड़ाई कोई नई बात नहीं है. राज्य कांग्रेस इकाई का राज्य गठन के ठीक बाद से मुख्यमंत्रियों और राज्य कांग्रेस कमेटी (पीसीसी) के प्रमुखों के बीच सत्ता संघर्ष का इतिहास रहा है. प्रारंभिक वर्षों में, पीसीसी प्रमुख जय नारायण व्यास ने तत्कालीन मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री के इस्तीफे की मांग करते हुए एक प्रस्ताव पास किया. विडंबना यह है कि उसी व्यास को 1954 में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा क्योंकि पार्टी के भीतर गुटीय राजनीति ने उन्हें ऐसा करने को मजबूर कर दिया.

1954 से 1967 के बीच भी जब मोहन लाल सुखाड़िया ने राज्य का बिना रुकावट नेतृत्व किया, तो उन्हें भी दो बार धमकियों का सामना करना पड़ा. पहली बार 1954 में जब पार्टी के टॉप नेताओं ने उनके खिलाफ गंभीर आरोप लगाया और इस्तीफे की मांग की. फिर 1961 में जब नाथूराम मिर्धा जैसे मंत्रियों की ओर से छोटा संकट खड़ा किया गया. हालांकि, सुखाड़िया खतरों का सामना करने में कामयाब रहे और सत्ता में बने रहे.
राजस्थान में गैर-कांग्रेसी राजनीति
पिछले कुछ दशकों में, राजस्थान बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई का रण बना हुआ है. राज्य में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार 1977 में जनता पार्टी की ओर से बनाई गई और भैरोसिंह शेखावत राज्य के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने. शेखावत 1990 में (जनता दल की मदद से) राज्य में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री बने.

आपातकाल के बाद के 1977 चुनावों के असाधारण दौर को छोड़ दें तो 1990 से पहले तक गैर-कांग्रेसी ताकतें दमदार चुनौती देने की स्थिति में कभी नहीं रही. हालांकि, जनता पार्टी असल में विभिन्न संगठनों के नेताओं और कांग्रेस छोड़ने वालों का एक इंद्रधनुषी गठबंधन थी. यहां तक ​​कि दूसरी दो टॉप पार्टियों (कांग्रेस के बाद दूसरी और तीसरी पार्टी) का मिलाकर वोट शेयर कभी भी कांग्रेस के वोट शेयर के करीब नहीं आ सका.
पहली बार 1993 में, कांग्रेस ने राज्य में खासी सियासी जमीन खोई. वोट शेयर के मामले में बीजेपी के बाद कांग्रेस नंबर दो पार्टी बन गई. बीजेपी के उदय और विकसित दो ध्रुवी प्रतियोगिता से स्थिरता की स्थिति बनी और 1990 के बाद से, सभी सरकारें अपने पूरे 5 साल के कार्यकाल को पूरा करने में सफल रही हैं.

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